चुम्बक

मैग्नेटाइट नामक पत्थर के अंदर हल्के लोहे के टुकड़े को अपनी तरफ आकर्षित करने का गुण होता है जिसे चुम्बक कहते हैं।

प्राकृतिक चुम्बक

प्राकृतिक में पाए जाने वाली चुम्बक प्राकृतिक चुम्बक कहलाते हैं।

कृत्रिम चुम्बक

कृत्रिम विधि द्वारा बनाए गए चुम्बक कृत्रिम चुम्बक कहलाते हैं।

जैसे – छड़ चुम्बक, घोड़ा नाल चुम्बक, चुम्बकीय सुई।

चुम्बक के गुण(quality of magnet)

चुंबकीय आकर्षण शक्ति उसके के दोनों किनारों पर सबसे अधिक एवं मध्य में सबसे कम होता है।

दिशात्मक गुण ( directional property)

यदि किसी चुंबक को धागे से बांधकर मुक्त रूप से लटका दिया जाए तो स्थिर होने पर इसका एक ध्रुव उत्तर की ओर तथा दूसरा ध्रुव दक्षिण की ओर हो जाता है।

चुम्बकीय अक्ष

चुम्बक के दोनों ध्रुव को मिलाने वाली रेखा चुम्बकीय कहलाती है।

चुम्बक की लम्बाई

चुम्बक के दोनों ध्रुवों के बीच की दूरी चुम्बक की लम्बाई कहलाती है।

ध्रुवों का आकर्षण एवं प्रतिकर्षण

चुम्बक का सामान ध्रुव एक दूसरे को प्रतीकर्षित करते हैं तथा विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं

चुम्बकीय क्षेत्र

चुम्बक के चारों ओर क्या हुआ चित्र जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सके चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है

1गौस = 10-4 टेस्ला होता है ।

चुम्बकीय बल रेखा

चुम्बकीय क्षेत्र में बल रेखाएं वह काल्पनिक रेखाएं होती हैं जो उस स्थान में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का सतत प्रदर्शन करती है चुम्बकीय बल रेखा के किसी भी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

चुम्बकीय बल रेखाओं के बीच गुण

ओस्टर्ड का प्रयोग (osrsted’s Experiment)

इस प्रयोग में एक चालक तार AB को दान कुंजी के द्वारा बैटरी के ध्रुव से जोड़ा जाता है तथा इस तार को एक चुम्बकीय सुई के ऊपर सुई के समांतर रखा गाया है जब तक तार में विद्युत धारा नहीं बहती सुई तार के समान बनी रहती है जैसे ही कुंजी में दबाकर तार में वैद्युत धारा प्रवाहित करते हैं चुमूबकीय सुई विक्षेपित हो जाती है अतः इस प्रयोग से सिद्ध होता है कि वैद्युत धारा या गतिमान आवेश अपनी चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।

बायो सेवर्ट का नियम

इस नियम के अनुसार किसी धारावाही चालक के लघु अवयव के किसी बिन्दु P पर उत्पन चुम्कीय क्षेत्र का मान ट्रैंगल B निम्न कारको पर निर्भर करता है –

(1) – यह चालक के प्रवाहित धारा के समानुपाती होता है।
ΔB ∝ i

(2)- यह चालक के अवयव की समानुपाती होता है
ΔB ∝ Δl

(3)- यह बिन्दु p की अवयव से दुरी r के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

ΔB ∝ 1/r2

(4)- यह अवयव की लम्बाई तथा हां अवयव को बिंदु P से मिलाने वाले रेखा के बीच बनने वाले कोण की ज्या (θ) के समानुपाती होता है।

ΔB ∝ Δ1/sinθ

उपर्युक्त चारों नियमों को मिलाने पर

ΔB ∝ i Δlsinθ/r2

ΔB ∝μ0 /4π i Δlsinθ/r2

अनंत लंबाई के ॠजुरेखीय की धारावाही चालक के समीप चुंबकीय क्षेत्र

अनंत लंबाई के ॠजुरेखीय चालक में विद्युत धारा i प्रवाहित होने के कारण चालक लंबवत r दूरी पर स्थित बिंदु p पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता

B ∝μ0i /2πr

Note चुंबकीय बल रेखा तथा विद्युत बल रेखा मे यह अंतर होता है की विद्युत बल रेखाएं बंद पास एवं खुला पास दोनों बनाता है लेकिन चुंबकीय बल रेखाएं केवल बंद पास ही बनाता है

चुम्बकशीलता

पदार्थ का वह गुण जिसके कारण उसके भीतर चुंबकीय बल रेखा की संख्या बढ़ या घट जाती है चुम्बकशीलता कहलाता है

एलमुनियम की चुम्बकशीलता लोहे से कम होती है

चुम्बकीय पदार्थ के प्रकार

महान वैज्ञानिक फैराडे ने बताया कि दुनिया का प्रत्येक पदार्थ चुंबकीय पदार्थ होता है

चुंबकीय प्रभाव के आधार पर इन को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है

1- प्रति चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर प्रतिकर्षीत होते हैं उन्हें प्रति चुंबकीय पदार्थ का जाता है

जैसे – Zn ,Au ,Pb ,H2o , etc

2- अनु चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर हल्का सा आकर्षित होता है उसे अनु चुंबकीय पदार्थ कहते हैं

जैसे – प्लैटिनम, क्रोमियम ,सोडियम etc..

3- लौह चुंबकीय पदार्थ

जिन पदार्थों को चुंबक के समीप ले जाने पर पूरी तरह आकर्षित होता है उसे लौह चुंबकीय पदार्थ कहते हैं

प्राकृतिक चुंबक

प्राकृतिक में पाए जाने वाला चुंबक होता है

जैसे- मैग्नेटाइट

सीधे धारावाही चालक तार का चुंबकीय क्षेत्र

जब किसी तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो उसके चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।

किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होने पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र पैटर्न चालक के आकृति पर निर्भर करता है।

धारावाहिक परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र

परिनालिका एक लंबी कुंडली को कहते हैं

1- परिनालिका गेम कुंडली में फेरों की संख्या बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ जाती है ।

2- धारा का मान बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ जाता है

3- परिनालिका के अंदर खाली भाग में लोहे का क्षण रखने पर चुंबकीय क्षेत्र प्रबल हो जाता है।

धारावाही परिनालिका एवं छड़ चुंबक में समानता

धारावाहिक परिनालिका एवं छड़ चुंबक दोनों स्वतंत्रता पूर्वक लटकाए जाने पर सदैव उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरता है

धारावाहिक परिनालिका एवं छड़ चुंबक दोनों के निकट चुंबकीय सुई लाने पर सुई विक्षेपित हो जाती है

Note- चालक तार के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा धारा के दिशा पर निर्भर करता है

मैक्सवेल का दक्षिणावर्ती पेंच का नियम

यदि किसी पेंच को दक्षिणावर्त घुमाया जाए तो पेंच की नोक आगे जाती है तथा पेंच को वामावर्त घुमाने पर पेंच नोक पीछे आती है।

यदि पेंच के नोक की गति ई दिशा चालक में विद्युत धारा की दिशा को व्यक्त करें तो पेट के घूर्णन की दिशा चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा होगी।

दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम

इसके अनुसार यदि दाहिने हाथ के उंगलियों को चालक के चारों ओर लपेटा जाए की अंगुलियों की लंबवत फैले अंगूठे की दिशा चालक में धारा की दिशा की ओर हो तो उंगलियों की लपेटने की दिशा चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा होगा ।

चुंबकीय क्षेत्र के कारण धारावाही चालक पर बल

यदि हम चुंबकीय क्षेत्र में किसी धारावाही चालक को रखे तो इस चालक पर बल लगने लगता है इस बल की दिशा चुंबकीय क्षेत्र तथा धारा दोनों के लंबवत होता है।

F = iblsinθ

बाएं हाथ की हथेली का नियम no 2

यदि हम अपने दाएं हाथ का पंजा पूरा फैला कर इस प्रकार रखें कि अंगूठा धारा की दिशा में तथा फैली हुई उंगलियां बाहरी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में हो तो चालक पर लगने वाला बल हथेली के लंबवत हथेली से धक्का देने की दिशा में होगा

फ्लेमिंग का बाएं हाथ का नियम

यदि हम अपने बाएं हाथ की अंगूठे तथा उसके पास वाली दोनों उंगलियां इस प्रकार फैलाएं की तीनों एक दूसरे के लंबवत रहे हैं तब यदि पहली उंगली चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और बीच वाली उंगली धारा की दिशा को बताती है तू अंगूठा चालक पर लगने वाला बल की दिशा होगा

विद्युत मोटर

विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करती है

सिद्धांत

जब किसी कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो उस पर एक बल युग्म कार्य करने लगता है यदि कुंडली अपने आज के परित घूमने के लिए स्वतंत्र है तो वह इस बल युग्म के कारण चुंबकीय क्षेत्र में घूमने लगती है

रचना

इसके निम्न प्रमुख भाग हैं-

1- क्षेत्र चुम्बक

यह एक शक्तिशाली विद्युत चुंबकNs है जिसकी कुंडली मैं दृष्टि धारा प्रवाहित की जाती है इसी से प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसमें कुंडली घूमती है

2- आर्मेचर

यह एक आयताकार कुंडली है जो नरम लोहे के रोड पर पृथक के तांबे के तार लपेट कर बनाई जाती है इस कुंडली में लपेट ओं की संख्या बहुत अधिक होती है आर्मेचर को बेल्ट और पुली की सहायता से किसी यांत्रिक साधन द्वारा चुंबक के ध्रुव ns के बीच तेजी से घुमाया जाता है।

विभक्त वलय

कुंडली के दोनों शीरे विभक्त वलय p औरq से जुड़े रहते हैं, विभक्त वलय पीतल का एक बेलन होता है जिसको लंबाई ने काट कर दो भाग p और q मैं विभाजित कर देते हैं यह दूरी से और आपस में एक दूसरे से पृथक के रहते हैं तथा आर्मेचर के साथ-साथ घूमते हैं।

कार्बन ब्रूश

विभक्त वलय ग्रेफाइट के बने दो ब्रूसो b तथा b1 से स्पर्श किए रहते हैं इन्हीं बूशो के द्वारा बह॔या परिपथ में धारा बहती है ।

कार्य विधि

जब बैटरी से आर्मेचर में धारा प्रवाहित करते हैं तो फ्लेमिंग कि बायें हाथ का नियम से आर्मेचर की भुजा एबी पर एक बाल नीचे की ओर तथा सीडी पर एक लंबा ऊपर की ओर कार्य करने लगता है ये दोनों समानांतर विपरीत तथा बराबर बल एक बल युग्म बनाते हैं जिससे आर्मी च 12 वाट दिशा में घूमने लगता है आर्मी च के साथ भक्त संबंधित हो जाता है जिससे कुंडली कुंडली में प्रवेश करने वाली धारा की दिशा बदल जाती है और आदमी चार उसी दिशा में घूमता है बैटरी का धन ध्रुव संदीप भाई ओर से आर्मी च से जुड़ा रहता है इस प्रकार प्रतिक्षा सीध चक्कर में आर्मी च में प्रवेश करने वाली धारा की दिशा परिवर्तित होती रहती है जबकि आर्मी च उसी दिशा में चक्कर लगाता है चलता रहता है।

विद्युत चुंबकीय प्रेरण

जब किसी परिपथ से होकर गुजरने वाली चुंबकीय बल मैं परिवर्तन होता है तब परिपथ में प्रेरित विभवांतर उत्पन्न हो जाता है तथा बंद परिपथ में प्रेरित धारा बहने लगता है यह घटना विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहलाती है।

दृष्टि धारा

वे धारा जिनका मान और दिशा समय के साथ नहीं बदलता उसे दृष्ट धारा कहते हैं।

प्रत्यावर्ती धारा

वे धारा जिसका परिणाम व दिशा समय के साथ बदलता है उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।

प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति

प्रत्यावर्ती धारा एक सेकंड में जितना चक्कर पूरा करती है उसे आवृत्ति कहते हैं।

डायनेमो या विद्युत जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलता है

यह दो प्रकार का होता है।

1- प्रत्यावर्ती धारा जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा द्वारा प्रत्यावर्ती धारा प्राप्त की जाती है।

2-दृष्टि धारा जनित्र

इसमें यांत्रिक ऊर्जा द्वारा दृष्टि धारा प्राप्त की जाती है।

2 Responses

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